Tue. Dec 18th, 2018

लघुकथा: समोसे की चटनी

वो घर के पास में ही समोसों का ठेला लगाता था। और जहां तक मैं जान पाया था भला आदमी था। राजनीति की चर्चा थोड़ा ज्यादा करता था। पर ये कोई ऐब तो नही। बच्चों को क्षमता से अधिक के स्कूल में पढ़ा रहा था और कोशिश करता था कि जहां तक हो सके उन्हें ठेले पर न बुलाये।

उस दिन शाम को मैं उसके ठेले पर समोसे तले जाने का इंतज़ार कर रहा था। कुछ मेहमान आने वाले थे और उनकी आवभगत का जिम्मा इन्ही समोसों पर था। तेल गरम होने में थोड़ी देर थी। वो बुरी तरह से भुनभुनाया हुआ था।

“ये साले बैंक वाले हम जैसे गरीबों को तो एक पैसा नही देंगे। पर देखो नीरव मोदी जैसे बड़े लोगो के लिए पूरा बैंक खोल के रख दिया कि आओ जितना चाहो ले लो।”

“साहब !! इस देश मे शोषकों की सरकार है। गरीबों की खून चूसने वाली। हम एक अठन्नी दबा लें तो ये सब कैसा जलील करते हैं और अमीरों का देखो हज़ारों करोड़ दबा लिया और ठाठ से विदेश उड़ लिए।”- अब वो मुझसे मुखातिब हो गया था।

मैंने सहमति में सिर हिलाया। बात तो सही थी।

“साहब, इसलिए इस देश मे हम गरीब गुरबों की सरकार होनी चाहिए जो गरीब का दर्द समझ सके। इन शोषकों की नही…”- वो बोलता चला गया।

पर मेरा ध्यान अब उसकी बातों पर नही था। मेरे बगल एक बेहद मैले कुचैले कपड़ो मे जो शक्ल और हुलिए से मज़दूर लग रहा था, आकर एक आदमी खड़ा हो गया था। शायद वो अकेला होता तो मेरा ध्यान उस पर न जाता। पर उसके साथ कुछ 9-10 साल का एक बच्चा भी था। शायद उसका बेटा था। और उसकी चेहरे की चमक और मासूमियत ये बता रही थी कि मज़दूर बाप ने तमाम दुश्वारियों के बावजूद उसे अब तक जिंदगी की रुखाइयों से बचा रखा था।

“एक समोसा दीजियेगा भैया”- उसने बच्चे की तरफ इशारा करते हुए बताया।

“तुम नही खाओगे बापू??”- बच्चे ने ऊपर अपने पिता के चेहरे की तरफ ताकते हुए कहा।

“अरे मुझे ये सब नही चलता। तुम खाओ न”- उसने पुचकारते हुए कहा। पर गरम समोसों के तरफ देखती उसकी ललचाती आंखों ने मुझे माज़रा समझा दिया था।

कुछ ही देर में उसके हाथों में गरम समोसा और लाल चटनी थी। पर चटनी की ये लाली समोसे को पा उसके खुश हुए चेहरे की लाली के सामने फीकी हो कर रह गयी थी।

उसकी ओर से मेरा ध्यान एक कार के हॉर्न से टूटा। 35-40 साल की एक महिला जो किसी अच्छे घर की लग रही थी और नाज़ में किसी 25 साल की युवती को मात दे रही थी मुझे अब कार से निकल ठेले की तरफ आती दिखी।

“दो समोसे देना। … अच्छा एक ही दो। पता नही कैसे तेल में बनाते होगे।”- आते ही उस महिला ने आर्डर दे डाला था।

कुछ ही देर में उसकी हाथो में भी समोसे पहुंच गए। और एक मैं बदनसीब !! दरअसल मेरे एकमुश्त 30 समोसों का आर्डर था। इसलिए मेरे पास इंतेज़ार करने के अलावा कोई चारा न था।

“अंकल, थोड़ी चटनी दीजिये न”- उसी बच्चे ने अपनी मासूम सी आवाज़ में फरियाद की थी।

“चल भाग यहां से। एक समोसे में बाल्टी भर के चटनी दूँ तुझे ??” समोसे वाले ने लगभग फटकारते हुए उसे कहा।

मायूस बच्चे ने कातरता से पिता की ओर देखा। शर्मिंदा बाप ने नज़रें दूसरी तरफ फेर लीं। निराश हो वो किनारे हो गया।
बमुश्किल 2 मिनट बीते होंगे या शायद उतना भी नही। समोसेवाला मेरे समोसों की गिनती कर रहा था। वही महिला फिर आ धमकी थीं।

“थोड़ी चटनी देना।” उसकी आवाज़ में रुखाई भरा अंदाज़ था।
“जी मैडम”- समोसेवाले की आवाज़ में एक अजीब सी खुशामद थी।

मैंने पलट कर उस बच्चे की तरफ देखा। महिला के प्लेट में गिरती चटनी की लाल धार, उसके ठीक पीछे भक्क खड़े बच्चे की सफेद शक्ल की पृष्ठभूमि में और लाल हो गयी थी।

– अनिकुल के कलम से

2 thoughts on “लघुकथा: समोसे की चटनी

  1. यथार्थ धरातल पर लिखी सुन्दर कथा

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