Sat. Feb 16th, 2019

अदभुत

अदभुत साहित्यिक सामग्रियों की श्रेणी.

गोबर

आखिर यह कैसी विडंबना है कि हम आत्मशुद्धि के नाम पर शरीर चमकाते हैं और स्वच्छता के नाम पर अपना घर जबकि मन अन्दर से और घर बाहर से मैला ही रह जाता है. पार्षद जी ने मन ही मन ठान लिया कि वे आने वाले गणतंत्र दिवस पर मास्टर जी को सम्मानित करेंगे स्वच्छता में अपना योगदान देने के लिए.

योर कोट के कार्यक्रम से साहित्यिक गतिविधियों में तेजी आएगी – राकेश नाजुक

राष्ट्रीय कवि संगम के जिला अध्यक्ष गीतकार राकेश नाजुक,जिला संयोजक राजू मानसाता और मिस्टर मोहित

बात करते हैं!

बात करते हैं,समस्याओं की,शिकायतें,सुझाव,निदान,प्रयास करता कौन?पहल करता कौन?बात करते हैं! निशा,तिमिर,घोर अंधकार,जानते हैं सभी,जीते हैं

मानसिक खुलेपन की आवश्यकता और परिसीमन

हम दूसरों से अपेक्षा ही क्यों करें, हम ही क्यों नहीं अपनी सीमा को तय करें कि हमें ऐसे रहना है, ऐसे चलना है, ऐसे बोलना है, ऐसे मिलना है, ऐसे उठना है आदि. हम अपने खुलेपन का परिसीमन क्यों नहीं कर सकते. हम इसका हमेशा गलत मतलब क्यों निकाल जाते हैं, यह सोचने की आवश्यकता आज बहुत जरुरी जान पड़ती है बजाये इसके कि हम सबके सुधर जाने की बात करने के हम स्वयं ही सुधर पायें.

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