Tue. Dec 18th, 2018

बचपन के दिन

बचपन के दिन

कितना अच्छा था, वो दिन! अपने बचपन का
मनमौजी था मै अपने मन का

वो हँसना, वो रोना, वो गुस्सा दिखाना
बातों ही बातों मे खुद रूठ जाना

दादू के संग रोज़ खेतों पे जाना
अम्मा के हाथों का खाना खिलाना

नहीं रह सकते थे अम्मा के बिन
बहुत याद आते हैं बचपन के दिन।

बचपन मे खेले थे हम गुल्ली डंडा
लगी जाके गुल्ली फूटा मुर्गी का अंडा

हुआ खूब झगडा हुआ खूब लफड़ा
साथियों के संग में गया मै भी पकड़ा

छीन लिया उसने मेरा गुल्ली डंडा
पूछा काहे फोड़ा तूने मुर्गी का अंडा

किया कान तौबा नहीँ गलती मेरी
था भागा वहाँ से बिना किये देरी

बचपन में खेले थे हम भी कब्बडी
गिरे इस तरह टूटी हाथों की हड्डी

लच्छीडाढ़ी व फुटबाल खेले
बचपन मे देखे बहुत हमने मेले

नहीँ रह सके कहीँ पापा के बिन
बहुत याद आते है बचपन के दिन।

वो कूइयाँ का पानी, वो गली की रेत
वो आम का बाग और चने का खेत

वो मकई की रोटी और सरसों का साग
ठण्डी के मौसम मे दहकती आग

गर्मी के दिनो मे खूब नहाना
तालाब मे जाके डुबकी लगाना

कंडॆ की राख पे आलू भुनाना
जम मन करे बाटी चोखा लगाना

वो बीते हुये पल न आयेंगे फिन
बहुत याद आते हैं बचपन के दिन।

: रचयिता

गया प्रसाद आनंद
गया प्रसाद ‘आनंद’ (चित्रकार)

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