Tue. Dec 18th, 2018

मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ!

मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ

जो मेरे हुस्न का दिवाना हो
रात दिन मेरा पीछे पड़ा हो
सोते जागते मेरे सपनों में खड़ा हो!

मैं उस पगला का प्यार चाहती हूँ
जिसके दिल पे सिर्फ मेरा डेरा हो
उसके धोंसले पर मेरा बसेरा हो!

मैं उस पगला लड़के का वफ़ा चाहती हूँ
जो मेरे बेवफ़ाई करने पर भी
जहान में मेरी रूसवाई न करे!

मैं उस पगला का साथ चाहती हूँ,
जो मेरे मरने के बाद भी साथ न छोड़े
साया बनकर मेरी रूह के साथ चले!

मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ
जिसके प्यार में मैं भी पागल हो जाऊँ
फिर हम दोनो पागल प्रेमी साथ जियें!

: रचयिता

कुमारी अर्चना, पूर्णियाँ, बिहार
कुमारी अर्चना, पूर्णियाँ, बिहार

1 thought on “मैं उस पगला लड़के को ढूढ़ती हूँ!

  1. साहित्यिक पटल का इस ओर भी ध्यान रहना चाहिए कि कुछ भी, प्रदर्शित करने से पहले उसे कृति की सारे पहलुओं से जाँच हो।भारी भरकम भूल जो व्याकरण की दृष्टि से दोषपूर्ण भी है ये ही नहीं अपितु लालित्यपूर्ण भाषाशैली की ओर भी टिप्पणी करने को विवश कर रही हो, ऐसी रचनाएँ जस की तस छाप देना किसी हद तक तर्क संगत नहीं लगता।

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