Mon. Dec 9th, 2019

मन की क्षुधा पिपासा,
सुप्त है अभिलाषा.
मृत हुई मृग-तृष्णा,
खण्डित हो गई आशा.

सभ्य सोच संतप्त है,
और ज्ञान अभिशप्त है.
स्वार्थ के प्रपंच में,
दूषित प्यार की भाषा.

क्या उत्थान, क्या पतन है,
ना जाने ये कौन सा वतन है.
व्योम धरा पर काल पाश का,
विस्तृत धुंध कुहासा.

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: रचियता

रविन्द्र कुमार 'रवि'
रविन्द्र कुमार ‘रवि’शिक्षक,
कवि, लेखक, संगीतज्ञ व साहित्यकार

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