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केरल का अतिथि देवो भवः

केरल का अतिथि देवो भवः

ऐर्नाकुलम से गाड़ी छुक-छुक करती पीछे की ओर धुआं छोड़ती हुई चली, ऐसा लगा मानो सबकुछ पीछे छूट रहा हो, वह केरल की हरियाली चारों ओर नारियल के पेड़ों का हुजूम, छतो पर फुनके पौधे, मानो से कह रहे थे धरती की हरियाली का स्वर्ग हो, वैसे गोडस ऑन कंट्री कहा जाता है.

           पूजा बार-बार गाड़ी की खिड़की से पीछे छूटते हरे भरे पेंड़ पौधों को देख रही थी. दादी नानी की किस्से कहानियों में सुना और डॉक्टर भी कहते हैं, हरे घास के पौधे पर चलने से ऑखों की रोशनी बढ़ती है. इसलिए पूजा ने अपना चश्मा उतार दिया ताकि सारी हरियाली को ऑखों में समा ले.

           पूजा के दक्षिण भारत जाने का सपना साकार हुआ अपनी मॉ के साथ और कुछ दोस्तों के साथ गर्मी की छुट्टियॉ मनाने आई थी.

           मौसम इतना सुहाना था गर्मी का अभास तक नहीं हुआ. कहाँ

 बिहार में मई-जून का महीना पसीने में नहानेवाला होता है. पर केरल की बात ही कुछ और थी. सुहाना मौसम, हल्की धूप कभी छॉव उसे लुकाछिपी का खेल और अपने बचपन की याद दिलाता था कि कैसे वो अपने दोनों भाई अन्नत और आंनद के संग मोहल्ले के बच्चों के साथ खेला करती थी.

           पर जैसे ही स्टेशन पर वापसी का रेल पकड़ने गई, भीड़ से खचाखच लोगों के शरीर के तापमान से वहाँ का वातावरण गर्म हो गया. किसी तरह ट्रेन की बोगी में चढ़ी. दो चार लफंगे खिड़की के पास खड़े थे पूजा को घूरे जा रहे थे वे केरल के नहीं थे. एक मजदूर सा दिख रहा था जो अपने घर वापस जा रहा था.

           आज बिना वातानुकूलित बोगी में सफर करने का अहसास हुआ. लम्बी दूरी के लिए गर्मी के मौसम में सफर करना कितना कष्टदायक होता है. केरल की यात्रा पर जाते वक्त भी बिना वातानुकूलित बोगी में सफर किया था, पर जाने की खुशी में गर्मी उड़न छू हो चुकी थी. पर वापसी पर सारा उत्साह जाता रहा.

           दो-तीन दिन ही केरल में रही. आने-जाने में ही सारी वक्त चला गया. पूजा कुछ दिन और रहना चाहती थी. क्योंकि दक्षिण भारत का इतिहास व भूगोल जो किताबों में ही पढ़ा था. उसको देखने का सुनहरा मौका था, वह वो सब कुछ देखना चाहती थी. जो कभी किताबों में पढ़ा था. ऐतिहासिक स्थल, बीच, समूद्र व पूरा दक्षिण भारत घूमना चाहती थी. पर पूरा केरल भी ना घुम सकी.

           रात बीती गुजरे दिनों की यादों में बीती सुबह ऑख खुली की खुली रही गई. ट्रेन में तीन चार किन्नर घुसे ताली बजाते हुए. उनको देखकर कोई नहीं पहचान सकता था कि वह किन्नर है.

           सफेद सुनहले पाढ़ी वाली साड़ी, माथे पर लाल बिंदी, हाथों में लाल-लाल चुड़ियॉ, बालों में रजनीगंधा के गजरे पारम्परिक व भारतीय वेश भूषा में किसी किन्नर को ऐसे पहली बार देखा था. पूजा एक टक देखती रही. बाकी मित्र कोई गेम खेलने में, कोई बातों में, तो गप्पे लड़ाने में लगे हुए थे.

           वह किन्नर सभी लोगों को बड़े आदर से नमस्कार कर रही थी और बोल रही थी, आपका केरल में स्वागत है आप हमारे अतिथि है. एक बार फिर से पूरे परिवार के साथ केरल आये.‘‘

           उसकी बातों पर पूजा यकीन नहीं कर पा रही थी किन्नर अतिथि देवो भवः कह रही है. भारत सरकार पर्यटन के लिए लाखों करोड़ों खर्च करती है.

           अमीर खान को विदेशी पयर्टक को लुभाने के लिए ब्रांड एम्बेस्डर बनाया गया. एक विज्ञापन बार-बार टी0वी0 पर दिखाया जाता है कि अतिथियों का अपमान ना करे सदा सम्मान करें विदेशी पूँजी-प्रवाह भारत की ओर हो.

           सवोर्च्च न्यायालय के फैसले के बाद किन्नरों को तृतीय लिंग का दर्जा मिला व पिछड़ा वर्ग का अधिकार प्राप्त हुआ, परन्तु समाजिक अधिकार व सम्मान से महरुम है.

           कुछ किन्नर बोगी में यात्रियों से पैसे मॉग रहे थे, परन्तु किसी भी यात्री से अभद्र व्यवहार नहीं कर रहे थे. किन्नर भी इतने सभ्य होते हैं ऑखो पर यकीन नहीं हुआ.

           पूजा को बी.पी.एस की परीक्षा देने जाने की  2012 की घटना याद हो आई. कैसे किन्नरों की टोली यात्रियों के पैकेट से जबरन कर पैसे निकाल रही थी. पूजा को फ्लैशबैक में सारी बातें एक-एक याद आई.

           कैसे एक किन्नर पूजा के भाई अन्नत की ओर आया. पहले तो पूजा को लगा वो उससे पैसे मांगेगा पर फिर कुछ नहीं बोला किन्नर अकसर पुरुषों से पैसे लेते हैं क्योंकि उनको पता है पैसा आदमी कमाता है और घर और बच्चे को औरत संभालती है.

           अन्नत ने पहले तो उसे ऊपर से नीचे देखा ये तो भला चंगा इन्सान है इसको चाहे कुछ भी हो जाये पैसे नहीं दूंगा. पर वो किन्नर तीन चार बार बोली पैसे दे चिकने, पैसे दे चिकने पर जब उसे लगा ये लड़का पैसे नहीं देगा तो उसने अपनी साड़ी उठा ली. अपना गुप्तांग दिखाया. सबलोगों की ट्रेन में ऑख फटी की फटी रह गई. पूजा ने अपना हाथ अपने मुंह पर रख लिया, पर कुछ ना बोली.

           वो किन्नर चला गया पर सवाल छोड गया ऐसा अभद्र व्यवहार क्यों? क्योंकि बखशीश मांगने पर पैसे नहीं मिले. कुछ लोग भली भॉति समझने लगे हैं यह एक तरह से भीख है.

           बात वैसे पैसेंजर में बहुत बहस चली इनको पैसे नहीं देना चाहिए. क्योंकि ये शारीरिक रुप से सक्षम है किसी भी काम करने के लिए. पर पूजा ने समर्थन किया क्योंकि दोष किन्नरों का नहीं है. हमारी समाजिक व्यवस्था का है जो स्त्रीलिंग व पुल्लिंग दो भागों में बंटी हुई है. तृतीय लिंग, नपुंसक लिंग के लिए व्यवस्था में वो मान सम्मान नहीं. उनको कोई काम पर रखता ही नहीं है. इसलिए मजबूरी में लोकल ट्रेन व विवाह, संतान पैदा होने पर लोगों के घरों में जाकर नवजात बच्चों को आशीष देते है, नाचते हैं, गाते हैं, दूसरों की खुशियों में नकली मुस्कान दिखाते हैं, ताकि बखशीश खूब ज्यादा मिले.

           पर यहाँ का नजारा ही कुछ और था वो भारत के अन्य किन्नरों से भिन्न थे. द्रविड परिवार भारत का मूलवासी है इसलिए इनके संस्कारों व परिवेश में भारतीय सभ्यता की झलकियॉ मिलती है. केरल के लोगों में शिष्टाचार कूट कूट कर भरा था. वह केरल जा कर पता चला. कितनी स्वच्छता, नियम, स्वतंत्र विचार के लोग, जो अपने कार्यो में लगे रहते हैं.

           केरल की सौ प्रतिशत शिक्षा की झलक साफ दिख रही थी. कितनी स्वच्छता, एक तिनका भी यहाँ-वहाँ फेंका नहीं मिला. प्लेटफॉर्म पर कोई प्राइवेट भेंडर नहीं, बस कैन्टींन से आप खाने-पीने की वस्तु ले सकते हैं. लोग दूसरे के मामले में व फालतू की तू-तू, मैं-मैं करने के बजाय अपने-अपने कार्यों में लगे रहते हैं. किसी ने सही कहा दूसरे के कार्यों के बजाय अपने कार्यों पर ध्यान दीजिए, तभी आपकी उन्नति, फिर समाज की, फिर राज्य की, फिर देश की होगी.

           केरल में भारतीय संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव वहाँ की भाषा, बोली, रहन सहन व पहनावें में झलकता है.

           तामिलनाडु में ट्रेन रुकी फिर वो किन्नर और उसकी मंडली एक एक कर उतर गये. अगले ट्रेन से फिर केरल जाने के लिए अपने राज्य में आने वाले अतिथियों के फिर से स्वागत के लिये.

-: रचयिता :-

कुमारी अर्चना
कुमारी अर्चना, पूर्णिया (बिहार)

1 thought on “केरल का अतिथि देवो भवः

  1. वास्तव में विचारणीय है, आखिर एक लेखक ही इन बातों को सभी तक पहुंचा सकता है। अद्भुत

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