Tue. Dec 18th, 2018

मशीन और मैं !

मशीन और मैं

दिन पे दिन मैं
आलसी हो रहा हूँ
आसक्ति के धोड़े पर
चढ़ गया हूँ!

नींद में भी
चल रहा हूँ
जागते हुए भी
सो रहा हूँ
क्या मैं उल्लू
हो रहा हूँ!

सुबह के सूरज को
न देख पा रहा हूँ
न रात चाँदनी को
बिजली की तेज रोशनी में
ढूँढ़ पा रहा हूँ!

दिन पर दिन मैं
आलसी हो रहा हूँ
काम को बोझ समझ रहा हूँ
आज के काम को कल पर
टाल रहा हूँ
कल ना आये
ये सोच रहा हूँ!

मैं ऊबा ऊबा सा हो
रहा हूँ
बुझा बुझा सा
जी रहा हूँ
मैं थका-थका सा
हो रहा हूँ
खिंचा-खिंचा सा
हो रहा हूँ
एक ही साँचे में
ढलकर
रोज-रोज की आंतरिक व बाहरी
भाग दौड़ में
“मैं” प्लेटफोर्म की तरह
पीछे छूट गया हूँ
मेरे वक्त की गाड़ी आगे निकल
चुकी है
मेरे साथ चले सभी यात्री
अपनी मंजिल को पहुँच चुके हैं
मैं बीच रस्ते में ही अटक चुका हूँ
निराशा के गर्त में धंस चुका हूँ
आशा की कोई किरण
कहीं न दिखती मुझको
आलस्य की पट्टी जबतक
न खुलती आँखों से!

क्या ये दोष मेरा है
या आज की आधुनिकता की
दिखावटी शैली का
जिसने व्यक्ति की जीवन-शैली को
परिवर्तित कर दिया है मशीन में
और हो गया हूँ मैं कृत्रिम व असामाजिक

क्योंकि यह मशीन संस्कृति दौर है
मुझे भी भावनाओं में नहीं बहना
बनना पड़ेगा भावशून्य रोबोट
तभी चल पाऊँगा मैं
प्रतिस्पर्धी बाजार में

-: रचयिता :-

कुमारी अर्चना
कुमारी अर्चना, पूर्णिया (बिहार)

2 thoughts on “मशीन और मैं !

  1. अन्योन्याश्रित संबंधों की सवेंदनशील व्याख्या. अदभुत

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