Tue. Dec 18th, 2018

बच्चों को उत्तम मानव बनायें

बच्चों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन उनके द्वारा प्राप्त अंको के आधार पर न करके उनके द्वारा किये साध्य के आधार पर करें ।

शिक्षा एक श्रेष्ठ व बुद्धिमतापूर्ण जीवन जीने का एक उत्तम साधन है । मानव के उद्भव काल से मानव ने अच्छे ढ़ंग से जीवन जीने के तरीकों की खोज की जिसमें शिक्षा ही सर्वोत्तम साधन प्रयुक्त हुआ ।

अतः हर युग में मानव ने एक शिक्षा प्रणाली रखी ताकि सर्वश्रेष्ठ नागरिकों के माध्यम से उन्न्त समाज का निर्माण हो सके । शिक्षा प्रदान करने के तरीकों में समय व सुविधानुसार परिवर्तन होते रहे जिसमें किताबी व व्यावसायिक शिक्षा दोनों शामिल है ।

आज हमारे समाज में बच्चों के व्यक्तित्व का मूल्यांकन पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित विषयों में लिखित परीक्षा में प्राप्तांकों के आधार पर किया जाता है ।

माता-पिता भी अपने बच्चों की तुलना उनके द्वारा लिखित परीक्षाओं में प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर करते हैं और उनमें निहित अच्छे गुणों और चरित्र को अनदेखा करते हैं जो कि बच्चों में कुण्ठा पैदा करती है और उनके व्यक्तित्व के विकास में भी बाधक है । जीवन में महत्त्व अच्छे गुणों का है । यदि कोई पढने में तेज है और सद्गुणी नहीं है, व्यावहारिक नहीं है तो वह ज्ञान बेकार है ।

हमें अपने बच्चों की तुलना पड़ोस में रह रहे या रिश्तेदारों के बच्चो से भी नहीं करनी चाहिए इससे उनमें हीनभावना पनपती है । हर एक बच्चा जन्म से ही उत्तम होता है और अपने साथ एक उत्तम गुण रखता है ।

हमें अपने बच्चों के इस गुण एवं प्रवृति की पहचान करके उसे बढावा देना चाहिए ताकि वे अपनी रूचि के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें और उचित व्यक्तित्व का निर्माण कर सकें ।

कई बार हम अपनी आशायें, अपने पड़ोसियों व रिश्तेदारों के सामने अपनी हैसियत बढाने के लिए, बच्चों पर थोप देते हैं और उन्हें अपने द्वारा निर्धारित मानदण्डों को पूरा करने के लिए बाध्य करते हैं जो कतई उचित नहीं हैं । अपने बच्चों को पास बिठाये और उनकी जिज्ञासाओं को शांत करें उनकी समस्याओं को समाधान करने में मदद करें । उनमें उत्तम गुणों का निर्माण करें । कभी किसी से उनकी तुलना न करें । किसी कार्य में या परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर उसे कदापि निष्कासित न करें क्योंकि सफल होने के लिए कभी-कभी असफलता भी जरूरी है । लिखित परीक्षायें बच्चों के व्यक्तित्व के एक पक्ष को ही जॉंचने का जरिया है, जबकि हम उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ही उसी लिखित परीक्षा में प्राप्तांकों से निर्धारित कर देते हैं ।

परीक्षा अच्छे अंकों से पास करना जरूरी है पर सब कुछ नहीं । अतः आइए हम अपनें बच्चों को संस्कारवान, गुणी, चरित्रवान व श्रेष्ठ नागरिक बनायें ताकि वे एक उत्तम समाज के निर्माण में रचनात्मक सहयोग दे सकें ।

ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों महिलाओं व पुरूषों के उदाहरण हैं जो कम पढे़ लिखें होने के बाद भी अपने हुनर से प्रसिद्धि को प्राप्त किये हुए हैं और अच्छा जीवन यापन कर रहे हैं ।

कई खिलाड़ी, कलाकार, शिल्पकार, चित्रकार आदि पढाई में अच्छे न होने पर भी राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय  स्तर पर ख्याति प्राप्त है । अतः बच्चों की अभिरूचि पर ध्यान देना जरूरी हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना आवश्यक है । कभी भी उसकी तुलना दूसरों से न करें क्योंकि वह अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है ।

यद्यपि हमारे जीवन में सूचना एवं प्रौद्योगिकी के आगमन से बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण और भी चुनौतिपूर्ण हो गया है क्योंकि इसके प्रभावों व दुष्प्रभावों से हमारे बच्चे भी अप्रभावित नहीं रह सकते हैं परन्तु यदि हम उन्हें आधुनिक विज्ञान, तकनिकी व भाषाओं के ज्ञान के साथ-साथ हमारी पुरातन मान्यताओं, संस्कृति व संस्कारों के बारे में भी जानकारी दे तो वे ज्ञान व विज्ञान का एक अद्भुत संगम होंगे ।

ओम प्रकाश यादव, प्राचार्य, डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, झुमरीतिलैया, कोडरमा

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