Tue. Dec 18th, 2018

मानसिक खुलेपन की आवश्यकता और परिसीमन

हम दूसरों से अपेक्षा ही क्यों करें, हम ही क्यों नहीं अपनी सीमा को तय करें कि हमें ऐसे रहना है, ऐसे चलना है, ऐसे बोलना है, ऐसे मिलना है, ऐसे उठना है आदि. हम अपने खुलेपन का परिसीमन क्यों नहीं कर सकते. हम इसका हमेशा गलत मतलब क्यों निकाल जाते हैं, यह सोचने की आवश्यकता आज बहुत जरुरी जान पड़ती है बजाये इसके कि हम सबके सुधर जाने की बात करने के हम स्वयं ही सुधर पायें.

इस आलेख को पढने से पूर्व ध्यातव्य हो कि आप एक अतिअवाश्यक और गंभीर विषय-वस्तु वाली सारगर्भित बातों का अध्ययन करने जा रहे हैं, इस आलेख में कोई भी ऐसी बात (शब्द, चित्र अथवा दोनों) नहीं हैं जो आपको किसी भी प्रकार से विचलित अथवा असहज करते हों. यह आलेख सीधे-सीधे उन विषयगत बातों और जरुरी सावधानियों की ओर इंगित करता है जो कि किसी भी उम्रवर्ग के बच्चों पर बिना किसी लैंगिक भेदभाव के साथ लागू होता है. आप इस आलेख का अध्ययन करने वाले माता-पिता, अभिभावकअथवा शिक्षक हो सकते हैं.

जैसा कि हम सभी यह जानते हैं कि किसी भी कार्य के सफल निष्पादन के लिए उपयुक्त स्थान का निर्धारण आवश्यक होता है, परन्तु जब किसी कार्य के लिए सही स्थान नहीं मिल पाता तब कार्य का पूर्ण होना संदेह के घेरे में आ जाता है. अपनी बात बच्चों से शुरू करते हैं. बच्चों को उनके उम्र के मुताबिक तत्संबंधी सामान्य ज्ञान दिया जाना अतिआवश्यक है. उन्हे गुड टच और बैड टच के बारे में जरुर बताएं, और सबसे अधिक जरुरत इस बात की है कि वे किसी भी बात को आपसे न छिपाते हों. इसके लिए उनसे समय-समय पर उनसे बात करें यदि वे स्वयं नहीं बताते तो आप को स्वयं ही पूछ लेना चाहिए. उन्हें इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि किसी भी असामान्य परिस्थिति में कैसे व्यवहार करना है. अपने बच्चों को यदि कहीं भेजते हों तो उस स्थान की पूरी जानकारी, कब जाना है और कब लाना है आदि बातो का खुद ख्याल रखें यदि आपके बच्चे किशोरावस्था के करीब हैं तो उनका विशेष ख्याल रखें, की वे किनसे मिलते जुलते हैं, उनके मित्र आदि कौन हैं, उनकी पारिवारिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि कैसी है आदि.

तात्पर्य यह है कि आप अभिभावक हो या शिक्षक आपको उन हर संभावित स्थिति अथवा परिस्थिति का बोध बच्चों को विभिन्न माध्यमो (नाटकों, कहानियों, पुस्तकों, कविताओं, कंप्यूटर पर स्लाइड्स, विडिओ आदि) से समय-समय पर कराना चाहिए. ऐसा नहीं कि संस्थाएं ऐसा नहीं कर रही हैं. पर जिस कार्य में व्यापकता होनी चाहिए वह मात्र खानापूर्ति भर हो कर रह जाती है. ऐसे सभी संस्थानों अथवा केन्द्रों पर बाल संरक्षण, विकास और शोषण उन्मूलन के लिए बनाये गए कानूनों के बारे में विस्तृत जानकारी का सूचना पट्ट होना चाहिए जिसे पढ़कर लोग उसे समझ सकें कि उनके अधिकार क्या हैं और किसी विषम परिस्थिति में उनका प्रयोग कैसे किया जा सकता है. जब तक कानून का भय नहीं होगा हिम्मत तो बढ़ेगी ही. इसलिए संस्थानों को चाहिए सम्बंधित कानूनों की विस्तृत जानकारी अपने संसथान की सूचना पट्टिकाओं पर आवश्यक रूप से लगायें.

मानसिक खुलेपन से हमारा तात्पर्य यह होना चाहिए कि हम किसी भी विषय पर अपनी सोच का दायरा कितना विस्तृत कर पाते हैं. अपनी संकीर्णता को त्याग समकालीन परिस्थितियों में किसी समस्या के प्रति हम कितने सजग हैं और उस दिशा में लोक-लाज की परवाह के चक्कर में अपने ऊपर कितना अन्याय होते रहते देना चाहते हैं. सामाजिक संकीर्णता को तोडना और मानसिक खुलेपन का परिचय हममें से कितने दे पाते हैं, और इसी क्रम में हम अन्याय सह जाते हैं, जिससे ऐसे लोगों का मनोबल और बढ़ता जाता है और हम आये दिन नकारात्मक समाचारों को सुनते हैं.

समाज में खुलेपन को सदैव ही ओछा माना जाता रहा है, ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए बशर्ते की हम खुलेपन के मापदंड को सही प्रकार से अपने परिवेश में ढाल सकें. जहाँ इसके समर्थक खुलेपन को किसी भी हद तक ले जाने को तत्पर दिखते हैं वही इसके आलोचक उनके इस हद पार करने की स्थिति को उजागर कर इसकी आलोचना कर बैठते हैं. जहाँ एक ओर खुलेपन के समर्थक कहते हैं शर्म देखने वाले के नजरों में होनी चाहिए, चाहे हम कितने ही खुले (शारीरिक अथवा मानसिक रूप से) क्यों न हों, वहीं दूसरी ओर इसके आलोचकों का कहना है कि वे चाहे जैसे भी हों हम ही शर्मशार हों, और वो अपनी मनमानी करते रहें. दोनों विचारधाराओ में कई अंतर्द्वंद्व व विरोधाभास भरे हैं.

रामायण का एक वाकया है जब सीता जी का अपहरण कर लिया जाता है और राम-लक्ष्मण वन-वन उन्हें खोज रहे होते हैं तो रस्ते पर गिरे माता सीता के एक आभूषण “चूड़ामणि” को उठाते हुए लक्ष्मणजी से पूछते हैं कि यह आभूषण तो सीता का है ऐसा लगता है, तो लक्ष्मणजी कहते हैं कि “भैया मैंने तो माता सीता को देखा ही नहीं जब भी देखा तो उनके चरण देखें हैं, ऐसे में भला मैं कैसे पहचान सकता हूँ इस चूड़ामणि को” अब सोचिये जरा आलोचकों से लक्ष्मण बनने की उम्मीद की जाती है, तो समर्थको से भी सीता जैसे आचरण की कल्पना की जानी चाहिए. पर आज के वर्तमान सामाजिक परिवेश में हम सीता और लक्ष्मण जैसे व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं रख सकते पर अपने पर नियंत्रण तो जरुर रख सकते हैं.

हम दूसरों से अपेक्षा ही क्यों करें, हम ही क्यों नहीं अपनी सीमा को तय करें कि हमें ऐसे रहना है, ऐसे चलना है, ऐसे बोलना है, ऐसे मिलना है, ऐसे उठना है आदि. हम अपने खुलेपन का परिसीमन क्यों नहीं कर सकते. हम इसका हमेशा गलत मतलब क्यों निकाल जाते हैं, यह सोचने की आवश्यकता आज बहुत जरुरी जान पड़ती है बजाये इसके कि हम सबके सुधर जाने की बात करने के हम स्वयं ही सुधर पायें.

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