Tue. Dec 18th, 2018

रेत के पन्ने

डर लगता है लड़खड़ाते कदमों से,
नन्हें परिंदों ने अपने पंख खोल रक्खे हैं.

किसने दिये हैं इनको हौसले,
न जाने उन्होंने क्या-क्या सीख रक्खे हैं.

हमें नीम से मत डराओ लोगों,
हमने भी जिन्दगी में कई स्वाद चक्खे हैं.

मेरा इम्तेहान मत लो ऐ लोगों,
हमने अपनी जिन्दगी में सब्र बांध रक्खे हैं.

हमारे जख्म उजाले में न लाओ लोगों,
हमने राज कई दफन रक्खे हैं.

मैं फिर भी बाटूंगा राय अपनी.
रेत के पन्नों पर हवा ने शब्द लिखे हैं.

: रचयिता

नीरज पाठक, संपादक, फुसरो ई-पत्रिका
नीरज पाठक, संपादक, फुसरो ई-पत्रिका

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