Tue. Dec 18th, 2018

कागज के जिहादी

है कटु संवाद परन्तु, मर्यादा में सुनाता हूँ,
ओ बाबर, खिलजी के नाती, एक बात बतलाता हूँ.

एक माँ के दूध का सिला तू नहीं दे पाता है,
दूसरी माँ की छाती पी के कत्लखाने भेजवाता है.

क्या दाढ़ी टोपी रखने से, तू अरबी बन जायेगा,
अपनी धरती की संस्कृति को, रसातल पहुंचायेगा.

शर्म-हया को छोड़, नाता गैरों से जोड़ लेता है,
तुगलकी अरमान रख, अपना ही घर जलाता है.

छूने चला है राष्ट्र जब, सभ्यता की नई ऊँचाई को,
तू किस मिट्टी का बना, ना समझ रहा सच्चाई को.

कितनी मासूम जिंदगियों को, जेहाद में झोंक देता है,
मानवता के ताबूत में जाहिलियत के कील ठोक देता है.

आदम की औलाद सही, पर आदम-युग ना लाओ,
विश्व के इतिहास पटल पर कालिख ना पुतवाओ.

क्या आस्था में ईमान नहीं था,
ये सनातन तो बेईमान नहीं था.

तलवारों के जोर पे मानव, क्या धर्म शास्त्र पढ़ पाता,
गर ऐसा होता तो सारा विश्व मुस्लिम बन जाता.

ईशा के प्रवर्तकों की गिनती श्रेष्ठ ना होती,
समझो ये सच्चाईयां, क्या संकेत हैं देती.

जीने के तरीके अपने, न औरों को सिखलाओ,
तुम ही तुम तो क्या तुम हो, सबको गले लगाओ.

इस चमन के फूल हैं सारे सबके रंग हजार,
इस मिट्टी की खुशबू से ही महक रहा संसार.

: रचयिता

रविन्द्र कुमार 'रवि'
रविन्द्र कुमार ‘रवि’ शिक्षक,
कवि, लेखक, संगीतज्ञ व साहित्यकार

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