Fri. Nov 15th, 2019
पतझड़

दाग दर्द के कहो कि अब मिटायें कैसे?

कोयला मन अधजला आग बुझायें कैसे?

 

जुड़े हों जो बरबस ही मन के तार कहीं

बिना बने राख इन्हें गंगा में बहायें कैसे?

 

ना लय है ना गीत और ना ही गजल कोई

कि रूठ बैठे हैं सारे राग इन्हें मनाएं कैसे?

 

अभी तो छू कर पतझड़ गुजरा है मन को

ढूंढते हो गीत-ए-मधुमास कहो गाएं कैसे?

 

अमावस पसरी बैठी है जब ढीठ सौतन सी

नेह बाती का दीप उर में कहो जलाएं कैसे?

 

जब लुट चुकी हो सारी की सारी ही दुनिया

कहो दास्तान-ए-इश्क ‘रूपा’ सुनाएं कैसे?

 

: रचयिता

रुपाश्री शर्मा श्यामांगिनी
रुपाश्री शर्मा ‘श्यामांगिनी’ के फेसबुक वाल से साभार 

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