Mon. Dec 9th, 2019

जंगल छोड़ो

जगल छोड़ो

चिंगारी से लगी आग को,
आज बुझाने आया हूँ,
मानो या फिर ना मानो
इक बात सुझाने आया हूँ| 

त्रिस्तरीय पंचायत निर्वाचन के बाद अब सरकारी तंत्र में आवश्यक बदलाव नजर आने लगा है. छोटे-छोटे झगडे और आपसी विवाद अब स्थानीय स्तर पर सुलझाने का सफल प्रयास किया जा रहा है. और तो और अब राज्य सरकार और गांवों की सरकार में आपसी समन्वय एवं साकारात्मक तालमेल दिखने लगा है. अच्छे-अच्छे काम हो इसके लिए सरकार भी संवेदनशील होने लगी है. निकम्मों एवं चापलूसों की पहचान की जा रही है.  उन्हें चिन्हित कर उनपर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है. अब प्रशासन गाँव की ओर मुखातिब हो उनकी सुध लेने लग गया है. मुख्य सचिव से लेकर जिला कलक्टर तक गाँव में रात्रि विश्राम की योजना बना रहे है. लोगो की संवेदना से जुड़ रहे है. सच कहो तो अब प्रशासन हरकत में आने लगा है. इसलिए कहता हूँ कि अब वक्त आ गया है कि तुम समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाओ. तुम्हारी माताए, बच्चे, बहुएं तुम्हे ‘पुकार‘ रही है.

याद करो बचपन के दिन
जब कुछ भी समझ न पाता था,
माँ के कपड़े गीले करते,
तब भी माँ को सब भाता था.
अब बता मुझे बीते दिन की
माँ की ममता का पान किये,
क्यों भटक रहे हो जंगल में,
तुम नक्सल की पहचान लिए.

तुम कहते हो- राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से निकलती है, पर मैं कहता हूँ- यह शक्ति जनमत से निकलती है, तुम कहते हो बन्दूक से छुटकारा पाने के लिये पहले उसे ठीक से पकड़ना सीखना होगा. पर मैं कहता हूँ – बन्दूक से छुटकारा पाने के लिए लोगों के दिलों को जीतना होगा. तुम कहते हो कि लोहे को  काटने के लिए लोहे का होना जरुरी है. पर मत भूलो जब एक लोहा दूसरे लोहे को काटता है तो एक स्थिर रहता है, एक चोट करता है तो दूसरा उसकी चोट सहता है. पर जब एक बन्दूक चले और दूसरी भी उसपर तन जाये तो बन्दूको से छुटकारा नहीं मिलती, बल्कि बन्दूको से गोलियां छूटती है तो शांति और अमन का स्थायी सपना चकनाचूर हो जाता है, इसलिए तो मै कहता हूं :

क्या बन्दूकों से स्थायी,
सब समाधान होता है,
मानो या फिर न मानो
बस व्यवधान होता है.

तुम्हारी नज़रों में कोई युद्ध, धर्म-युद्ध नहीं होता, दुश्मन-दुश्मन होता है. छिपकर ही सही, घात लगाकर ही सही उसे मात देना मकसद होता है, और यह सब तुम समाज में व्याप्त शोषण को आधार मानकर करते हो. क्या तुम्हे लगता है कि जिस शोषण की तुम बात करते हो वह पलक झपकते दूर हो जायगा? नहीं, पर प्रयास जारी रहे और या समाज के सभी वर्गो के बीच संवेदनात्मक समन्वय के रूप में हो न कि इस सन्दर्भ में मात्र निरोधात्मक कानूनों के निर्माण से. कदम-दर-कदम नियमों के निर्माण से समस्याओं का स्थायी हल नहीं निकल सकता. कुछ चीजों को स्वतंत्र छोड़ दो. वे स्वयं समायोजित हो जायगी. सबका हल कानून नहीं हो सकता. आपसी विचार-विमर्श से भी ढेर सारी समस्याओं का हल निकल आता है. ऐसा हल जो तुम सोच भी नहीं सकते.

मैं कहता हूँ- विचार में परिवर्तन लाओ. उसकी धाराओं में परिवर्तन लाओ. जीवन के मूलदर्शन को समझो. आज हो, कल नहीं, बस, तुम्हारे विचार ही जिन्दा रहते हैं.

तुम चाहते हो ना पूंजीपतियों की तानाशाही नहीं चले पर तुम चाहते हो कि सर्वहारावर्ग की तानाशाही कुछ दिनों के लिए आये और संक्रमण की समाप्ति के बाद एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना हो. पर ऐसा हुआ क्या? मैं कहता हूँ कि कब तक इंतजार करोगे? बने बनाये मकान (स्थापित लोकतंत्र) अगर मिलते हैं तो क्यों नहीं घर बसाते? हाँ, मनचाहा परिवर्तन जो पूरे समाज को एक नयी दिशा दे सके, उसमे कर डालो. कोई रोकेगा क्या?

राज्य को शोषण की मशीन मानते हो. ऐसा नहीं कहते. राज्य और सरकार तुम्हारे जन्म लेने के पहले से ही जन्म लेकर मृत्यु तक की घटनाओं एवं परिस्थितियों पर हर संभव जीत की गवाह बनती है.

शोषण, भय और अराजक स्थितियों से समाज को मुक्त करना चाहते हो तो उस समाज से दूर मत भागो. समाज में ही रहकर उसे दूर करने के उपाय सुझाओ. उनसे लड़ो. बंदूकों से नहीं, विचारों से. सोये समाज को जगाओ, पर सोये-सोये समाज में रहकर, उससे दूर हटकर नहीं. मैं तो कहता हूँ-

सूत्र अगर कोई हो जिससे
शोषण मुक्त समाज हो,
लौटो बतलाओ लोगों को
फिर तेरे सर ही ताज हो.

मैं कहता हूँ- घर में जब कुछ समस्याएँ दिखती हैं तो उसे देखकर दूर नहीं भागा करते. तुम्हे मानना चाहिए कि दूर रह रहे लोगों को भी जब इसकी जानकारी मिलती है तो दूर से चलकर वे घर आते हैं न कि घर में रह रहे लोग घर ही छोड़ कर भाग खड़े होते और दूर होकर उनसे निजात पाने के उपाय सुझाते हैं. ऐसा नहीं होता कि वे घर ही छोड़ देते हैं. तो फिर शोषण का सामना क्यों नहीं कर पायें, क्यों नहीं सोचा अपनी बूढी माँ और बच्चों का? क्यों नहीं ले गए उन्हें अपने साथ? मन में भय व्याप्त था. पता नहीं आगे कब क्या होगा. काश! तुम घर छोड़ जंगलों में नहीं गए होते. काश! तुम शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज और लोगों की आवाज के साथ मिलकर आवाज बुलंद किये होते, क्योंकि जब एक आवाज अनेक आवाज में बदल जाये तो शोषण तो मिटेगा ही, हर घर, हर गाँव रौशन हो जायगा.

तुम पुलिस की बंदूकों से नफरत करते हो. पुलिस शोषण करती है. बंदूकों का भय दिखाकर मनचाहा काम करा लेती है. पर मैं कहता हूँ कि कितने ऐसे थे और अब कितने ऐसे हैं. क्या कोई आंकड़ा है तेरे पास. ऐसा नहीं कि सारी पुलिस शोषक है. कुछ शोषक भले दिखते हों पर वे पुलिसतंत्र में ही नहीं वे किसी भी तंत्र में शामिल रहते तो शोषक ही दिखते. अब वक्त बदल रहा है. तंत्र में शोषणकर्ताओं की पहचान कर उनपर आवश्यक कार्रवाई भी की जा रही है. और फिर कितने पुलिस वालों की बंदूकें गोलियां उगलती हैं. गोलियों को उगलने की जरुरत ही न पड़े, पुलिसतंत्र हमेशा यही चाहती है. मैं तो चाहता हूँ कि तुम अब तंत्र के साथ हो लो. मैं अफ़सोस करता हूँ कि-

क्यों सरकारी तंत्र पर
रह गई न तेरी आस्था,
विस्फोटों से उडती पुलिया
बंद हुआ तब रास्ता.

मैं कहता हूँ कि सिस्टम की आवाज बनो. बारूदों से कभी-कभी विस्फोट कर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की जगह समाज की मुख्यधारा में जुड़कर शोषण के विरुद्ध बारूद से नहीं वरन अपनी बुलंद आवाज से ऐसा विस्फोट करो कि तेरी एक आवाज ही समाज में तेरी स्थायी उपस्थिति का प्रमाण बन जाय. मैं तो कहता हूँ कि आत्मसमर्पण करो. आत्मसमर्पण तेरी बुजदिली नहीं जिन्दादिली का प्रमाण बने. तेरी ऊर्जा परमाणु ऊर्जा से कम नहीं जिसे अनियंत्रित छोड़ दी जाय तो विस्फोट और नियंत्रित कर ली जाय तो देश के काम आये. आओ अपने समाज में लौटो. मैं मानता हूँ कि अब भी प्रशासन में कुछ सौदागर बैठे हैं. अगर तुम जानते हो तो उनके नाम उजागर करो. सरकार अब आत्मसमर्पण की नई नीतियाँ भी बना रही है. नीतियों में आवश्यक संशोधन भी किये जा रहे हैं. मुकदमे वापस लेने की कार्रवाई की जा रही है. राष्ट्र की सीमाओं के रक्षक बनो. मैं नहीं चाहता अब ऐसी कोई चूक हो कि खेतों में फसलों की जगह बन्दूक हो. मैं चाहता हूँ खेतों में फसलें उगें. तेरे घर वापसी पर चारो ओर होली और दिवाली हो, बिन मौसम भी चारो ओर हरियाली हो.

राजेश पाठक
प्रांतीय सचिव,
राष्ट्रीय कवि संगम
झारखण्ड इकाई.

1 thought on “जंगल छोड़ो

  1. कंक्रीट के जंगल से बढ़िया है, इसलिए नहीं छोड़ना चाहते हैं, शायद, अद्भुत आवाह्न है।

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