Tue. Dec 18th, 2018

अधेड़ उम्र की औरत गांव से बाहर काफी दूर एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर चिल्लाचिल्ला कर अपने आपको कोसती हुई रो रही थी, और कह रही थी– ये मेरी गलती थी भगवान, मैं अपनी जवानी में होने वाली उस गलती पर आज भी शर्मिंदा हूं हे भगवान! मैं मानती हूं कि मैंने वह पाप किया है जिसका मैं प्रायश्चित करके भी उस पाप से मुक्त नही हो सकती, पर मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरी उस गलती को क्षमा करके दोबारा गलती ना करने का एक बार फिर से मौका दें हे भगवान, मैं हमेशा के लिए ये प्रतिज्ञा करती हूं कि भविष्य में भी किसी और को ये गलती करने की सलाह नही दूंगी मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है अतः अब आप फिर से मेरी झोली में मेरी खुशियाँ वापिस डाल दें पन्द्रह साल हो गये मुझे वह गलती किए हुए

पन्द्रह साल से हर साल इसी दिन यहां आकर अपनी गलती का प्रायश्चित करती हूं आप प्रभू इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं परिवार में सभी मुझे बांझ कह कर ताना मारते रहते हैं मेरी सास के कहने पर मैंने अपनी एक दिन की बच्ची को यहीं इसी बरगद के पेड़ के नीचे रखा था हे बरगद तू ही मेरे इन आंसूओं की परवाह करके मेरी बच्ची को मुझे वापिस लौटा दे पहली बच्ची को मारने के लिए मेरे सासससुर और ननद ने बाध्य किया था अब वही सासननद मुझे बांझ कहकर घर निकल जाने के लिए कहती हैं आज मेरी बच्ची का ये पन्द्रहवां जन्म दिन है आज वो जिंदा होती तो पन्द्रह साल की हो गई होती और बच्चे ना सही मुझे मेरी वही बच्ची वापिस लौटा दो मैं उसे ही अपना बेटाबेटी समझ कर छाती से लगा लूंगी कमसेकम समाज को मुंह तोड़ जवाब तो मैं दे ही सकती हूं कि मैं बांझ नही हे भगवान, आज आपको मेरी मनोकामना पूरी करनी होगी, नही तो आज मैं भी यहां पर अपना सिर पटकपटक अपनी जान दे दूंगी यह कहकर वह बरगद के तने में अपना सिर पटक-पटक कर जोरजोर से रोने लगी उसके माथे से खून बहने लगा आंखों के आंसू और सिर का खून दोनों मिल कर धार बन कर बहने लगी तभी

बस मां, अब ओर खून बहाने की जरूरत नही मैं गई

यह आवाज सुनते ही वह औरत रूक गई, ओर इधर-उधर पागलों की तरह देखने लगी तभी उसके पीछे से दो छोटेछोटे नन्हें हाथों ने उसके कंधो को छुआ वह पिछे मुड़ी तो एक सुन्दरसी पन्द्रह साल की परियों जैसी मासूम लड़की खड़ी थी उसने उस स्त्री के आंखों के आंसू पोंछे मस्तक पर लगे घावों को अपने नन्हें हाथों से सहलाया उनका खून साफ किया वह स्त्री इसे सपना समझ कर बेहोश हो गई जब होश आया तो उसका पति रमेश और वह लड़की दोनों उसकी सेवा में लगे हुए थे रमेश की गोद में उसका स रखा हुआ था वह लड़की कभी अपनी मां के घावों को गीले कपडे़ से साफ कर रही थी तो कभी अपने आंचल से हल्कीहल्की हवा कर रही थी उसे होश आया तो रमेश से बोली

आप, आप यहां कैसे?’

मैं तो यहां आपके आने से पहले ही गया था

पर मुझे तो नही दिखाई दिये

मुझे पता था कि हर साल आप इस दिन अर्थात हमारी बच्ची के जन्म दिन को यहां जरूर आती हो सो मैं सुबह जल्दी ही तैयार हो कर ऑफिस जाने की बजाय यहां इस बरगद की शाखाओं पर बैठकर तुम्हारे प्रायश्चित को देखता था

और ये लड़की ?‘

यही है हमारी बच्ची, जिसके लिए तुम कई साल से यहां प्रायश्चित के लिए आती हो  (यह सुनते ही वह स्त्री उस बच्ची के गले से लिपट कर जोरजोर से रोने लगी और बारबार उससे माफी मांगने लगी) मुझे माफ कर दो मेरी बच्ची मैं सासननद के चक्कर में फंसकर तुम्हें मरने के लिए यहां छोड़ गई अब मैं अपनी बच्ची को जरा सा भी दुख नही होने दूंगी इतने साल से मैं तुम्हारी सूरत देखने को भी तरस गई थी तुम कहां रही मेरी बच्ची ?‘

पांच साल तक तो पापा ने मुझे अपने दोस्त के यहां रखा उसके बाद मुझे स्कूल में पढने के लिए भेज दिया हर शनिवार को पापा मेरे स्कूल पहुंच जाते थे ढे़रों चीज और चॉकलेट खिलौने लेकर आते पापा ने कभी मुझे आपकी कमी महसूस ही नही होने दी पांचछह साल से हर जन्म दिन पर पापा मुझे यहां लेकर आते हैं पहले तो आप खाली रोकर ही प्रायश्चित करती थी, मगर आज जब आप अपने सिर को पटकने लगी तो मुझसे रहा नही गया पापा के बारबार मना करने पर भी मुझे बोलना पड़ा नही पता, नही तो क्या हो जाता मां मुझे एक बात बताओ क्या लड़के ही सबकुछ होते हैं ? हम लड़कियां कुछ भी नही यदि हम ही इस संसार में नही होंगी तो बताओ लड़के कहां से होंगे यदि एक औरत ही औरत की दुश्मन हो जायेगी तो कैसे काम चलेगा संसार में वो दिन दूर नही जब पुरूष ही पुरूष होगें, और उनका भी वजूद जल्द ही समाप्त हो जायेगा सृष्टि के विकास के लिए दोनों का ही होना जरूरी है तुम जिनकी सीख से मुझे यहां छोड़कर गई थी वो भी तो औरत ही थी उन्हें तो किसी ने भी नही मारा तुम कैसे पागल हो गई हो जो उनकी सीख तुमने मान ली

भगवान की मर्जी के बिना पत्ता तक भी नही हिलता मेरे यहां छोड़ने पर भगवान तुमसे रूष्ट हो गये और तुम्हें कोई अन्य औलाद भगवान ने नही दी अन्यथा तुम अपना प्रायश्चित कैसे करती? भगवान सब का हिसाबकिताब करता रहता है मैं भगवान से प्रार्थना करूंगी कि राखी बांधने के लिए एक भैया जरूर दे

मांबेटी का मिलन हो चुका हो तो अब घर चलें मुझे बहुत भूख लगी है खाना खाकर हम बाजार जायेंगे अपनी गुडि़या का जन्म दिन मनाना है बड़ी धूमधाम से इसका जन्म दिना मनायेंगे

‘सुनो जी, तुमने अपनी गुडि़या का नाम क्या रखा है

इसका नाम हमने ममता रखा है चलो ममता घर चलते हैं

यदि अब भी दादी और बुआ ने मुझे देखकर निकल जाने को कहा तो……?‘

अब तो मैं ही पूरे घर वालों को देख लूंगा क्योंकि अब तुम्हारी मां मेरे साथ है पहले तो यही उन्ही के कहे में थी ये मेरे साथ है तो पूरे जहान में मैं अकेला ही  लड़ने को तैयार हूं

तीनों घर पहुंचे तो घर को पूरी तरह से सजाया गया था चारों तरफ रंगबिरंगे रिबनगुब्बारे लगे हुए थे ममता की दादी और बुआ नए कपड़े पहने हुए थी अन्दर चौक में गीत गाये जा रहे थे ममता को दरवाजे पर रोक कर उसकी आरती उतारी गई नजर उतारने के बाद दरवाजे के अन्दर उसकी बुआ और दादी लेकर आई यह देख रमेश और उसकी पत्नी निर्मला को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगा दोनों बाहर ही खडे़ रहे थे ये क्या दोनों मांबेटी को ये क्या हो गया ?

जो औरत घर में पोती के नाम से भी घूरती थी आज वही औरत अपनी पोती की आरती उतारकर गोद में उठाकर अन्दर लेकर गई

पर इनको कैसे पता चला कि आज ममता घर आने वाली है

इसका तो खैर मुझे भी नही पता, चलो अन्दर चलकर बात करते हैं

दोनों अन्दर पहुंचते हैं अन्दर पहुंचने पर देखा कि घर के बड़े से कमरे में एक मेज पर बहुत सारी मिठाईयां रखी हैं औरतें शुभ गीत गा रही हैं  रमेश की बहन सभी से ममता का परिचय करा रही थी ममता की दादी सभी औरतों को मिठाईयां बांट रही थी चारों तरफ से ममता के आने की ख़ुशी की आवाजें रही थी यह देखकर रमेश ने कहा

मां ये इतनी सारी मिठाईयां और ये औरते और गीत……..? ‘

ये सब हमने तैयार किये हैं, मैंने और तुम्हारी बहन रेनू ने हमें सुबह ही तुम्हारे दोस्त से पता चल गया था कि आज मेरी पोती ममता यहां आने वाली है, पर उन्होंने ये नही बताया कि उसे लेने तुम दोनों ही गये हो मैं तो सोच रही थी कि खुद तुम्हारा दोस्त राजू ही लेकर आयेगा आज मैं बेहद खुश हूं मेरी परियों सी पोती को सीने से लगाकर रखूंगी मुझे पता लग गया है कि लड़के और लड़की में कोई अन्तर नही होता मेरे लिए तो मेरी पौती ममता ही पौता है, और हां निर्मला तुम भी सुन लो खबरदार,  मेरी पोती को कभी दुख दिया सभी ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे

एक साल बाद उनके घर पुत्र ने जन्म लिया सभी की ख़ुशी का पार ना रहा भगवान ने ममता को राखी बांधने के लिए एक भाई भी दे दिया और निर्मला और रमेश को एक पुत्र

: रचयिता

नवल पाल प्रभाकर गाँव साल्हावास जिला झज्जर हरियाणा (भारत) मोबाइल: 9671004416
नवल पाल प्रभाकर
गाँव साल्हावास
जिला झज्जर
हरियाणा (भारत)
मोबाइल: 9671004416

4 thoughts on “दूसरा जन्म

  1. शुक्रिया, उस विषय पर लिखने के लिए, जो अभी समाज और सरकार की नज़रों से दूर है। आपकी कहानी हमारी लड़ाई की पूरक है। ज्यादा जानकारी के लिए आप इसे एक्सप्लोर कर सकते हैं। इस विषय पर और कहानियों का इंतज़ार रहेगा। आपकी अनुमति से इसे अपने पोर्टल और फेसबुक पेज पर भी पोस्ट करना चाहते हैं-
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    1. अवश्य ही. आप हमें आपके उद्देश्य में साथ ही समझें.

  2. आदरणीय अंकित मित्तल जी और आदरणीया मोनिका जी आप दोनों का आभार जो आपने इस कहानी को पढ़ा और पसंद किया और हाँ मोनिका जी आप जहाँ तक इस कहानी को पहुँचाना चाहती हैं पहुंचा सकती हैं

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