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शब्दो के पुल

शब्दों के पुल संजय वर्मा 'दृष्टि' अदभुत समीक्षा डॉ सारिका मुकेश

साहित्य कभी विवश और लाचार नहीं होता है क्योंकि उसमे परिस्थितिओं का रुख मोड़ने की अदम्य क्षमता होती है। इसलिए वर्तमान में प्रभाव स्वरुप, स्फुट छंद, लघुकथाए, चुटकुले, कहावते और हायकु जैसी छोटी छोटी रचनाए पसंद की जाने लगी है। हायकु पाँच-सात-पाँच के वर्ण क्रम में तीन पंक्तियो कि कुल सत्रह अक्षरी अतुकांत कविता होती है। साथ ही इसमें समकालीन वास्तविकताओं को समझने-परखने की शाब्दिक क्षमता होती है। हायकु स्वयं में एक पूर्ण कविता होती है।

शब्दों के पुलडॉ सारिका मुकेश का बेहतरीन हायकु संग्रह है।

देखो सूरज हसीन सुबह से करता प्यार,
झूँठी दिलासा दिलाती रही मुझे तुम्हारी याद,
कीमती मोती ह्रदय की सीप में

तुम्हारी यादें ये ऐसे हायकू है जिसमे प्रेम शब्दों के पुल पर चल कर दिल को छू लेता है। वही मन की भावना की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति, संबंध के सही मायने को बयां करती है-

टूटे संबंध ढह गए पल में
शब्दों के पुल मन के दर्द “न चला पता”में
मन मीठे दर्द का अहसास करता है

मेरी ख़ुशी से जल उठे चिराग तेरी आँखों में,
न चला पता उठता क्यों भीतर मीठा सा दर्द,
पाकर प्रेम पिघलता है दर्द मोम के जैसा

लगभग तीन सौ हायकु का बेहतरीन बेहतरीन संग्रह है। पठनीयता का चुंबकीय आकर्षण पाठको को बांधे रखता है। डॉ सारिका मुकेश ने सटीक बात कही “वेदना जब मुखर हो उठती है, संवेदना को जब स्वर मिलते है तो वो कविता के रूप में परिलक्षित होती है।” यही बात हमें शब्दो के पुल में भी देखने को मिली। हायकू प्रगति के पथ पर साहित्य जगत में अपना परचम लहराए यही हमारी हार्दिक शुभकामनाये हैं।

हायकु संग्रह – शब्दों के पुल
रचनाकार -डॉ सारिका मुकेश
प्रकाशक -जाहन्वी प्रकाशन ए ७१
विवेक विहार फेज-11
दिल्ली -110095
मूल्य -200 रुपये
संपर्क -वी आय टी
विश्व विधालय बेल्लोर -632014

: समीक्षक
संजय वर्मा”दृष्टि “
125 भगत सिंग मार्ग
मनावर (धार )

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