Sat. Feb 16th, 2019

नीरज कुमार पाठक अद्भुत

गोबर

आखिर यह कैसी विडंबना है कि हम आत्मशुद्धि के नाम पर शरीर चमकाते हैं और स्वच्छता के नाम पर अपना घर जबकि मन अन्दर से और घर बाहर से मैला ही रह जाता है. पार्षद जी ने मन ही मन ठान लिया कि वे आने वाले गणतंत्र दिवस पर मास्टर जी को सम्मानित करेंगे स्वच्छता में अपना योगदान देने के लिए.

मानसिक खुलेपन की आवश्यकता और परिसीमन

हम दूसरों से अपेक्षा ही क्यों करें, हम ही क्यों नहीं अपनी सीमा को तय करें कि हमें ऐसे रहना है, ऐसे चलना है, ऐसे बोलना है, ऐसे मिलना है, ऐसे उठना है आदि. हम अपने खुलेपन का परिसीमन क्यों नहीं कर सकते. हम इसका हमेशा गलत मतलब क्यों निकाल जाते हैं, यह सोचने की आवश्यकता आज बहुत जरुरी जान पड़ती है बजाये इसके कि हम सबके सुधर जाने की बात करने के हम स्वयं ही सुधर पायें.

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