Tue. Dec 18th, 2018

नारी का सम्मान सभ्य समाज की पहली शर्त है।

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बच्चियों व महिलाओं की सुरक्षा राष्ट्र हित के लिये सर्वोपरि है। समाज में लिंग भेद के नाम पर असमानता विंध्वस का परिचायक है। 21वीं शताब्दी में पुरुष व महिलाएँ समतुल्यता की ओर अग्रसर हैं। जिस समाज में बच्चियों, महिलाओं को परस्पर समानता का भाव दिया जाता है, उस समाज का ही उत्थान होता है, अन्यथा पशु प्रवृति, उस समाज के बर्बर होने का परिचायक हो जाता है। जिस तरह अनेक कारकों के चलते समाज में लिंगानुपात में कमी दिन प्रतिदिन देखी जा रही है, एक दिन इसकी भयावहता से सभी परिचित अवश्य ही होंगे। देश मे बच्चों व महिलाओं दोनों के साथ अन्याय / हिंसा तेजी से बढ़ते दिख रहे हैं। छोटी छोटी बच्चियाँ यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। बच्चों / महिलाओं दोनों की स्थितियाँ कमोवेश एक जैसी है। यह सभ्य समाज के लिये बिलकुल सही नही है। इसके घातक दुष्परिणाम सभी को भुगतने होंगे।

जिस देश की संस्कृति में नारियों की पूजा की जाती रही है वहाँ के बच्चों / महिलाओं की अस्मिता खतरे में है। लिंग भेद के नाम पर जन्म से पूर्व, भूर्ण हत्या से लेकर जीवन के अंतिम समय तक के झंझावातों को महिलाएँ झेलती रहती हैं। सहनशीलता का दूसरा नाम है, पर आज के समाज की स्थिति देखकर मन असंतुष्ट हो रहा है। आज महिलाओं को उपभोग की दृष्टि से देखा जा रहा है, जिस देश में महिलाओं का पूजन किया जाता रहा है। सभ्य समाज के विपरीत समाज वैचारिक व मानसिक विध्वंस की ओर बढ़ता जा रहा है जो विचारनीय है।

पौराणिक किवदंतियों में महिलाओं को हमेशा भारत में सम्मान की नजर से देखा जाता रहा। पूजन की परंपरा भारतीय समाज में देखी जाती रही है, इसके विपरीत उसका निकृष्ट रूप वर्तमान समय में देखा जा रहा है। समाज में पितृ सत्तात्मक साम्राज्य रहा है, जिस वजह से महिलाओं पर अत्यधिक हिंसा होती रही है। हिंसा के रूप में शारीरिक, भावानात्मक, संवेदनात्मक शोषण होता रहा है। लिंग भेद के नाम पर भी समाज में पूर्वाग्रह पाया जाता है, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। बच्चियाँ कम उम्र से ही परिवार मे उपेक्षित कर दी जाती है। लड़के व लड़की के बीच माता-पिता परवरिश के तौर-तरीके में अंतर कर देते हैं। जब वह जन्म देने वाले माता-पिता के प्यार, सहकार, मातृत्व से लिंग भेद के नाम पर छली जाती हैं, तब यही बात एक लड़की के अंतर्मन को सर्वाधिक प्रभावित  करती है। यही से इनमें सहनशीलता के भाव में संबलता दिखती तो है, पर बच्चियाँ बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक आने के दौरान इसी उहापोह से गुजरतीं हैं। वयस्क होने के बाद भी अनेक तरह की परेशानियों को झेलते झेलते बड़ी होती हैं, विवाह के समय दहेज-प्रथा के नाम पर शोषित होती हैं और अपने पति, सास, ननद से विभिन्न रूपों में प्रताड़ित होती रहती है, कुछ दिनों के बाद अपने बच्चों से, ऐसे ही उनकी पूरी जिंदगी में कुछ न कुछ झंझावातें आती रहती हैं।

आजकल यौन उत्पीड़न, कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न, परिवार के व्यक्ति से ही उत्पीड़न, आम बात हो गयी है। यौन उत्पीड़न की घटना बचपन से ही देखने को मिल रही है। समाज मे ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ती दिख रही है। वर्तमान समय मे पितृसत्तात्मक के साथ-साथ मातृसत्तात्मक परिवेश भी दिख रहा है, जिससे पिता के साथ आज माताएं भी कार्य कर रही हैं। 21वीं शताब्दी में महिलाओं में आत्मनिर्भरता, स्वाबलंबी होने की अत्यधिक प्रवृति दिख रही है जो एक अच्छी पहल का धोतक है। किसी पर निर्भर होना या परजीवी होना, हिंसा के अनेक रूपों को जन्म देता है। आज महिला अपने को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रही हैं क्योंकि उन्हें यह पता है कि पर-निर्भर रहेंगे तो पुरुष समाज अपना प्रभुत्व दिखाएंगे। इस लिये आज परम्परवादी सोच को दरकिनार करते हुए हाथ से हाथ मिलाकर आत्मनिर्भर बनने पर जोर दी जा रही है। यह एक सभ्य समाज के पुनर्निर्माण की दिशा में नए आयाम का सूचक है।

: आलेख

डॉ.प्रभाकर कुमार, मनोवैज्ञानिक, प्राध्यापक, कृष्ण बल्लभ महाविद्यालय, कथारा सह सदस्य बाल कल्याण समिति, बोकारो
डॉ.प्रभाकर कुमार,  मनोवैज्ञानिक, प्राध्यापक, कृष्ण बल्लभ महाविद्यालय, कथारा सह सदस्य बाल कल्याण समिति, बोकारो

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