Tue. Dec 18th, 2018

कुछ तो बता, जाने वाली हवा,
तेरे महकने का, क्या राज है.

ना मय, ना साकी, ना कोई दवा,
मेरे बहकने का, क्या राज है.

ये कैसी है फैली यहाँ चांदनी,
अभी अर्स पे चाँद आया नहीं.

हवाओं में भी है घुली रागिनी,
पर मैंने कोई गीत, गाया नहीं.

करे शोर पंक्षी तो, दिल ने कहा,
इनके चहकने का, क्या राज है.

शुरू हो गई क्या, यहाँ आशिकी,
फ़िजाओं में शबनम बरसने लगी.

जज्बात में अब ये तन्हाईयां,
गज़ल बनके लब पे थिरकने लगी.

जवां सुर्ख गालों पे खिलती हया,
नज़र में शरारत, ये क्या राज है.

: रचयिता

रविन्द्र कुमार 'रवि'
रविन्द्र कुमार ‘रवि’ शिक्षक,
कवि, लेखक, संगीतज्ञ व साहित्यकार

 

 

 

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *