Tue. Dec 18th, 2018

श्रद्धेय गोपाल दास ‘नीरज’ जी को सादर समर्पित 

कौन दाता है और कौन याचक,
इस भौतिक संसार में सभी को कुछ चाहिए
और जिसके पास अधिक है वह तो क्षणिक है
अभी वह दाता अभी वह याचक.
यहाँ कौन है भिखारी?
वह 
देते नहीं थकता,
हम  लेते नहीं थकते.

क्या क्या नहीं बिकता इन बाजारों में,
खरीदने को खरीददार और बिकने को कोई तैयार ही तो चाहिए
यहाँ कौन है व्यापारी?
वह बेचते नहीं थकता
हम बिकते नहीं थकते.

बड़ी आसानी से हम लुट जाने अथवा
लूट लिए जाने की दुहाई दे जाते हैं,
पर कभी सोच नहीं पाते
यहाँ कौन है लुटेरा?
वह लूटते नहीं थकता
हम लुटते नहीं थकते.

हम सब जीवन रुपी रंगमंच के कलाकार हैं,
अपने अपने किरदार में हैं,
पर कभी कभी लगता है कि क्या
सचमुच हमारे बस में कुछ है क्या.
यहाँ कौन है मदारी?
वह नचाते नहीं थकता,
हम नाचते नहीं थकते.

आखिर हम किसको मानते हैं
किसी के तो पदचिन्हों पर चलना चाहते ही हैं
हम सब या फिर नहीं.
यहाँ कौन है अनुयायी?
वह चलाते नहीं थकता,
हम चलते नहीं थकते.

जो गुनाह करते हैं / जो गुनाह कराते हैं
या कि जो गुनाह हो जाने देते हैं.
यहाँ कौन है अपराधी?
वह कराते नहीं थकता,
हम करते नहीं थकते.

अन्याय सहना या अन्याय हो जाने देना
दोनों ही घातक है.
यहाँ कौन है अन्यायी?
वह सहाते नहीं थकता,
हम सहते नहीं थकते.

सभी ज्ञान बाँट रहे हैं,
इधर से सुन उधर सुना रहे हैं,
सुन कोई नहीं रहा बस कहने की जल्दी है सबको.
यहाँ कौन है महाज्ञानी?
वह सुनाते नहीं थकता,
हम सुनते नहीं थकते.

हमारे जीवन में, हमारे जीवन का हर स्वाद का
अहसास करने वाला कौन है?
इतने स्वाद हैं
फिर भी क्यों जीवन बेस्वाद लगता है.
यहाँ कौन है रसोईया?
वह चखाते नहीं थकता,
हम चखते नहीं थकते.

विधाता के रचे खेल से कौन बच पाया है,
जो कुछ भी घटित है सब उसीकी तो माया है.
यहाँ कौन है कन्हैया?
वह ठगते नहीं थकता,
हम ठगाते नहीं थकते.

तुम लाख जहर घोलो इस मिट्टी में जहालत के,
ये कुछ बीज हैं बाब-ए-इल्म से उग ही आएंगे.
यहाँ कौन है किसान?
वह उगाते नहीं थकता,
हम उगते नहीं थकते.

© नीरज पाठक

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