Mon. Apr 22nd, 2019

नारी तुम्हे नमन

ईश्रवर की सन्तान है, दोनों नर और नारी ।
प्रकृति ने दोनों में ही, शक्ति भरी है सारी ।

समाज ने दोनों में, अन्तर कर दिया भारी ।
एक को ताकतवर माना, दूसरे को बेचारी।

सबला को अबला मानकर, भूल की है भारी ।
दो आंखों का सिद्धान्त, वर्तमान में भी जारी।

एक आंख से पुरूष, व दूसरे से देखते नारी।
निरन्तर कार्य करने पर, मिलती है इसे कटारी।

घर, स्कूल, समाज में क्यों भेद अभी भी जारी।
अभी भी ढोनी पड़ रही है, दुःख भरी पिटारी।

कुछ ना समझ शब्दो से आज भी करते है ,बमबारी।
सर्वत्र नीचा दिखाने की, फैली है महामारी।

सहनशीलता को समझा है, उसकी कमजोरी ।
कौन सा क्षेत्र ऐसा है, निभाई न हो जिम्मेदारी ।

धनार्जन के बाद भी नहीं बनी है, सम्मान की अधिकारी ।
घर, परिवार, समाज, में,संघर्ष अभी भी है जारी।

इतने कष्टो के बाद भी, नहीं अभी यह हारी।
अवसर मिलने से ही, सम्भव होगी बराबरी।

हिम्मत तुम में बहुत अधिक है, धन्य धन्य हो नारी।
ईश्रवर तुम्हे और शक्ति दे, होगे उसके आभारी ।।

: रचयिता

कालिका प्रसाद सेमवाल

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