Mon. Apr 22nd, 2019

यशधारा : महिला रचनाकार विशेषांक मील का पत्थर

संजय वर्मा "दृष्टी". डॉ दीपेन्द्र शर्मा, याशधारा

शब्दों से श्रृंगारित भावों की धारा “यशधारा” में महिला रचनाकार की 44 रचनाओं का समावेश कर यशधारा  के संपादक डॉ श्री दीपेंद्र शर्मा ने इसे  महिला रचनाकारों के  लिए  महिला जगत को दिये जाने वाला विलक्षण सम्मान का प्रतीक बताया है भोज शोध संस्थान की यह सम्मानीय पहल निसंदेह प्रशंसनीय है।

इसी तारतम्य में विशेष संपादकीय  अभिव्यक्ति प्रा .रेखा सिंघल ने ठीक कही –

“जब किसी किताब का संस्करण महिला रचनाकारों से रचा हो तो उसका तो कहना ही क्या? क्योकिं नारी तो शब्द भाव और अर्थ की त्रिवेणी है। उसके द्धारा रचे काव्य भाव-विचार की परंम्परा एवं संस्कृति झरने सी लगती है।

डॉ अंजुल कंसल कनुप्रिया ने प्रकृति के विभिन्न रंगों का अपनी रचना में बखूबी से शब्द भाव को ढाला है-

“आसपास जब से खुले,
बसंत के स्कुल,
पढ़े प्रीत का पहाड़ा,
मौलसिरी के फूल”

श्रीमती ज्योति प्रकाश खत्री-

‘जरा हट के तू दुनियाँ से अलग पहचान पैदा कर,
नहीं भूले से भी दिल में मगर अभिमान पैदा कर”

हौसला अफजाई की बात कही वही पहचान बनाने हेतु एक साहस भी गजल के माध्यम से दिया है।

श्रीमति सीमा असीम-

“न जाने कौन रही यूँ ,निशानी छोड़ कर गुजरे,
है नदियाँ सा सफर अपना, न हम गुजरे न हम ठहरे”

गजल में प्रेम की कशिश एक अंतर्मन को तलाशता मर्म भाव गजल को बेहतर बनाता है।

श्रीमति शशि पुरवार –

“आँख पथराई उदर की,
आग जलती है,
मंजिलों से बेखबर,
बदजात चलती,
जिंदगी दम तोड़ती,
गुमनाम झाड़ी में”

नारी के संघर्ष की व्यथा को बताती जिंदगी की मंजिल वाकई कठिन होती है जो की वर्तमान के सच को बयां करती है। अनुभूतियों और  दर्द  को पेश किया है, जो क़ाबिले तारीफ़ है।

डॉ चन्द्रा सावता –

“जीना  मरना बस रह गया,
उसके लिए एक समान
भवन टूटे, पर घर न टूटे
एक यही था अरमान

नारी की दशा के विभिन्न पहलुओं पर “वह औरत” में चिन्तनीय विचार बया किये।

श्रीमति वीणा सिह –

‘कौन है जो हवा के
झोके सा आता है
छू के तन को मेरे
एक सिहरन सी छोड़ जाता है

काव्य के इस सौंदर्य -बोध को परखने के लिए पुनीत   ह्रदय की आवश्यकता है ।

श्रीमति श्रीति राशिनकर –

‘संतोष की लकीर छा जाती है
पिता के चेहरे पर
बच्चे की पहली सीढ़ी
चढ़ने पर’

जीवन के यथार्थ का चित्रण काव्य रचना में बेहतर तरीके से किया  जो मन को छू  जाता है और यह मानव जीवन में सभी को  तक़रीबन प्राप्त  होता है यानि संतोष धन।

डॉ मंजुला आर्य –

“जिंदगी आग है,
जिंदगी फ़ाग है
जिंदगी साधना है,
और है  आराधना
बनके जोगन जगत में
मीरा सी फिरे

जिंदगी का यही रूप जिंदगी के विभिन्न पहलुओं का दर्शन कराता है व जिंदगी में एक नए रंग भी भरता है।

डॉ वंदना कुशवाह- “छोटा  सा सपना “काव्य रचना में  पॉलीथिन पर प्रतिबंधित करने की मांग को बेहतर तरीके से रखकर प्रदुषण मुक्त वातावरण बनाने की पहल की है ।

सुश्री वाणी दवे – लघुकथा के जरिए सेवानिवृत उपरांत कार्य की महत्वता और व्यक्ति की कार्य शैली के प्रभावी रूप की पहचान की जो की संदेश परक्  होकर मन को छू  जाने वाली लघुकथा बन पड़ी।

श्रीमती देवयानी नायक -सेना के जवानों के प्रति अटूट श्रद्धा व् देश भक्ति की भावना जगाती पंक्तियाँ ‘”ये राष्ट्र  की सुरक्षा एवं समृद्धि की पहचान /इनसे रोशन है देश इनको पूजता सारा जहान “।

श्रीमति रंजना फतेपुरकर – ‘महकती हवाएं भी /किसी की छुअन का /अहसास दिला देती है /कभी हौले से कुछ कहती है /कभी ख़ामोशी ओढ़ लेती है “प्रकृति  की सुंदरता में दासता  के रंग भरती  कविता में कशिश की छवि स्पष्ट रूप से देखी  जा सकती है । कविता दासतां का सुन्दर रूप  प्रतिबिम्बित हुआ है।

श्रीमति अनीता मुकाती (आनन्द )-

“खुशबू की तरह तेरे पहलू में बिखर जाऊँ
एक तेरा ख्याल आये शरमाऊं सँवर जाऊँ “

ख्यालों का सजीव चित्रण भी करतीं उस की सृजनात्मक सोच की एक कशिश पैदा कर खवाबों को सच करने की अदम्य क्षमता रखती। कवयित्री, शायरी में के क्षेत्र में अपनी शसक्त पहचान बनाने वाली और मंच पर, टीवी, आकाशवाणी की सक्रिय भूमिका निभाने वाली रचनाकार से सभी  भली-भान्ति परिचित है।

श्रीमति अमृता  भावसार- गीत विधा में निपुर्ण रचनाकारा ने “गीत’ रचना में महिलाओं को हक़ की परिभाषा,वात्सल्य भावना, त्याग के मायने बता कर फैशन में सराबोर नग्नता दिखाई  दे ऐसे वस्त्रों   पर अंकुश  लगाने पुनीत बात रखी है जिससे रचना सन्देश परक  बन गई है।

श्रीमती अनीता मंडलोई –

“स्वालंबी हूँ ,न अबला हूँ न बेचारी हूँ
गर्व है खुद पर कि में भारत की नारी हूँ”

नारी शक्ति स्त्री ही तो निडरता  का साक्षात् रूप होती है। बस साहस की बुलंदियों पर होंसलों  का मकसद बरक़रार रखना होगा ताकि सही मायने में सम्मान की अधिकारी बन सके । महिला सशक्तिकरण और भी मजबूत बने इस हेतु महिलाओं की सक्रियता की भूमिका होना चाहिए ताकि समाधान  एवं मुश्किलों का सामना करने हेतु वे हर कठिनाइयों का सामना निडर होकर कर सके साथ ही अपने हक़ की परिभाषा को सही मायने में पा सके ।

श्रीमती आभा चौधरी –

“देश की सुरक्षा के लिये,
दिया तूने बलिदान
रो-रो करके बेटा  मेरा,
हुआ बुरा हाल”

हमारी तिरंगे के प्रति  चेतना और संवेदना को जागृत करती हैं साथ ही बलिदान  और आसरा के मतलब भी समझाती है। शहीदो को नमन करती रचना में देश भक्ति के दर्शन कराती है वही वर्तमान हालातो की स्थिति को बया करती है।

श्रीमती सोनल पंजवानी-

‘टूटे एहसास ने
जुड़ना सिखाया है मुझे
लम्हों के फिसलने ने
जूझना सिखाया है मुझे
इसे एहसास ही रहने दो
इस जज्बात को पास ही रहने दो
हर पल तुम्हे महसूस हो
उस पल को साथ ही रहने दो”

में अधूरा एहसास की  तस्वीर महसूस के आईने से  साफ़ दिखाई देती है. पढ़ने वालों को यह दर्द दिलों में  जरूर जा लगता होगा साथ ही एहसास भी जीना  सिखाता है प्रमाणित होता है।

श्रीमति  गरिमा मेहता – ‘विनम्रता ” क्या होती है और आज अधिकतम प्रतिभावान होते हुए भी मनुष्य में न्यूनतम विनम्रता तो होनी ही चाहिए ये भाव लघुकथा के माध्यम से प्रदान किये जो की हरएक  को जीवन में अपनाना ही चाहिए ।

श्रीमति दुर्गा पाठक –

“आप विश्व दॄष्टि
मै सूक्ष्म चिराग फिर भी मन सोच उठा
मै सांध्य दीप जल उठा
हे दिनकर आप तनिक विश्राम कर लो
“दीप की महिमा को रचना में बेहतर तरीके ढाला है। दीप से जुड़े  विचारों को शब्दों शिल्पी की तरह तराश कर उन्हें रचना  में एक आकर निर्मित किया ।

श्रीमती कोमल वाधवानी “प्रेरणा”- “बहाना” लघुकथा में एक कटाक्ष किया है-दीदी, गलती मेरी नहीं। सरकार  ने कानून ही गलत बनाया है  महिलाओं को नोकरी में आरक्षण, जिसके कारण मेरे समान पुरुष भी  बेरोजगार हो गए है। “बेरोजगारी की व्यथा पर वर्तमान हालातो का सटीक चित्रण कर निठल्ले शब्द में ऊर्जा का समावेश किया।

श्रीमति कविता विकास -शब्द और अर्थ के मायनो की तुलनात्मक उदाहरणों से काव्य रचना को सरोबार कर समझने की क्षमता की और इशारा किया वही बिना अर्थ वाले शब्दो को परे  किया।

श्रीमती ज्योति जैन –

“भाषा “रचना में “मुस्कराहट,
प्यार व स्पर्श की भाषा
क्योकिं भाषा दीवार नहीं
सेतु होती है।

“भाषा  की दशा और दिशा बिगाड़ने वाले लोगों को इन कविताओं के अर्थों से ज्ञान मिले तो  शुद्ध भाषा का रूप प्राप्त  हो कर नफरतो की दीवार तोड़ी जा सके यदि भाषा को सेतु बनाया जाकर उस पर अपना स्नेह अर्पित किया जाए ।सब को अपनी भाषा प्यारी लगती है बस एक दूसरे की भाषा को समझने में जाग्रति रूपी पुल पर चलना याद होना चाहिए। बेहतर रचना है।

श्रीमति रूचि सक्सेना -“एक दूसरे के बिना दशा का वर्णन वाकई अधूरा होता है चाहे प्रकृति ,मानव ,जीव -जंतु  का हो । बेहाल जीवन की कल्पना से सृजनता विलुप्ति की कगार पर पहुँचती वही  मिलान सजीवता की वापसी करता है यही भाव कविता में समावेश भी है ।

श्रीमती सुषमा दुबे -“टेक केयर “रिश्तोंमें आये बदलाव को बखूबी  पेश किया वही नजर अंदाज से टेक केयर में एक पक्षीय की दशा को  लघुकथा में रखा।

श्रीमति प्रतिभा श्रीवास्तव -बर्थ दे पार्टी में बच्चो के तोड़ फोड़ की प्रवर्ति को देखते हुए हिंसक होने की कल्पना की ये अपने अपने मन की उपज है जबकि बच्चों की स्वाभाविक प्रवर्ति होती है मौज मस्ती करना बच्चो के उत्साह को हिंसक भविष्य में होने के सपने देखना अनुचित है।

श्री मति बंदना खेड़े – खंडित आस्थाएं मालवी बोली लिए  आकांक्षाओं स्मृतियों को संजोती दादी की कहावतों के सहारे धन और तन को बेहतर तरीके से प्रतिपादित  कर खंडित आस्थाए का संस्मरण वाकई मन को छू गया।

श्रीमती मीरा जैन – लघुकथाकार में इनका नाम सर्वोपरि माना  जायेगा। लघुकथा का सर “अरे बेटा, तुम दादाजी के अकेलेपन की चिंता बिल्कुल मत करों इन्हें तो कोई नहीं चाहिए ” वृद्धा अवस्था में अकेलेपन क्या होता है व् उन्हें साथ न रखने की अग्रिम सोच मन में अश्रु के भाव भर गई।  ये ही वर्तमान के हालात है जिन्हें गहराई  से समझना होगा ताकि अकेलेपन को दूर कर उन्हें वृद्धा आश्रम भेजे  जाने की प्रवर्तिया जन्म ना  ले।

सुश्री मनीषा मन –

हर सितम जा जा के डोलती है आँखे
खामोश हो के भी बोलती है आँखे

रचना मन के मर्म को स्पर्श करती  हैं। आँखों के विचार  चेतना और संवेदना को जागृत करने की क्षमता रखते है।

श्रीमति अलका जैन- उधारी पर गहरा कटाक्ष किया । सर पर उधारी का कर्ज और शोक इस तरह पुरे किया जाना यानि घर बार बेच तीर्थ करना कहावत की स्पष्ट झलक दिखलाई पड़ती है।

श्रीमती विनीता सिह  चौहान-

“कुछ करने का दृढ़ निश्चय हो
मन में ऊर्जा अतिशय हो
काम ऐसा कर जाओ
जग में तुम्हारा एक परिचय हो
बीते जीवन अनुशासन में
एक दीप जलन अपने जीवन में

अनुशासन की प्रेरणा प्रदान करने वाली गीत की पक्तियां भावनात्मक शैली दीप को माध्यम  बनाकर सुन्दर अभिव्यक्ति प्रदान की है।

डॉ हेमलता चौहान खुश्बू –

बरसो तलक जीती रही
पतझड़ की तरह
इस जीवन को अबके बरस तुम आए हो

इंतजार  का प्रतिफल तुम्हारे आने से मुकद्दर भी बदल देता है कविता का सार है।

श्रीमति प्रतिभा शिंदे – नन्हा बीज  काव्य रचना में बीज से वृक्ष बनने तक और उसकी उपयोगिता को बड़े ही अच्छे ढंग से दर्शाया  है वही वृक्ष को न काटे जाने संबंधी हिदायते भी दी है जो की प्रेरणादायी है।

श्रीमति ज्योत्स्ना सिह- भक्ति भाव से परिपूर्ण कविता में गो सेवा और राज धर्म निभाने का सन्देश दिया एक नयापन काव्य रचना में  झलकता है।

श्रीमति अर्पणा शर्मा- नारी का साकार रूप और महिला दिवस पर महिलाओ का मान  समाज में रहे अक्षुण की बात उठाई है जो की सही भी है।

श्रीमती आशागंगा शिरढोणकर- “कही यह उस अजन्मी लावारिस छोड़ दी गई- मारने के लिए जिंदा गाड़ दी गई या फिर भाई के सामने सहमी-सहम, निरीहता से जीने वाली बेटी की आह तो नहीं? “बेटी की आह क्या होती है। लघुकथा में समझाया है।

श्रीमति मंजुला भूतड़ा –

“माँ सम्मुख न हो फिर भी
होने का आभास ही होता
वही मुझे तो पग -पग पर
जीने का सम्बल देता”

माँ की  दुआ, माँ का कहना माँ शब्द को पूजनीय बनाता है वही नेक राह पर इंसान को चलना सिखलाता है।

सुश्री साहिबा  व्यास- हमारी लाडली बेटी हिंदी में कई रंग भरे है वही साहित्य उपासकों की बेटी बन हिंदी का मान बढ़ाया । भाषा की हित में बेहतर कविता  बनी है।

श्रीमती अनीता सक्सेना- पास में बैठे एक सज्जन बोले बेटा। थैंक्स तो तुम्हे दादाजी को देना चाहिए ,यदि उनके पैर पर न गिरता तो  तब तो तुम्हारा मोबाईल टूट ही जाता। लड़का शर्मिदा हो गया लेकिन बुजुर्ग दादाजी मुस्कुरा कर बोले ,कोई बात नहीं बेटा। चाहे मोबाईल टूटता या मेरा पैर ,खर्च तो दोनों में बराबर ही आता न।”  टूटने का खर्च लघुकथा में समझाइस एक हित कारी  प्रयोग रहा।

श्रीमति विभा जैन- “नारी” सेवा त्याग, ममता की मिठास, रिश्तोंकी धुरी, मोम की गुड़िया, देवियां, मधुरतम राग, आदि नारी में कई गुण है जो सर्वत्र  प्राचीन समय से ही पूजनीय रही बस सदा सब के मन में नारी के प्रति सम्मान के भाव सदैव जाग्रत रहे। नारी के पक्ष में बेहतर कविता रची।

यशधारा  में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना में रची बसी विकृतियों, समस्याओं और जटिलताओं में  स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं को पहचान वही नारी शशक्तिकरण की और उनके हक़ की परिभाषा की विभिन्न रचनाओं के जरिये पहचान कराई।  निसंदेह सफलताओं की और अग्रसर होगा यही शुभकामनाएं है।

प्रकाशक – भोज शोध संसथान धार
संपादक -डॉ दीपेंद्र शर्मा
मूल्य – 50 /-
संपर्क विक्रम ज्ञान मंदिर ,लाल बाग़  परिसर
धार (म प्र ) 454001

समीक्षक –

संजय वर्मा "दृष्टी " 125  शहीद भगत सिंग मार्ग मनावर जिला धार म प्र
संजय वर्मा “दृष्टी”
125  शहीद भगत सिंग मार्ग
मनावर जिला धार म प्र

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